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Bihar Kesari : हम बिहारवासी "श्रीबाबू" को "भारत रत्न" देने की मांग करते हैं....

  


हम बिहारवासी "श्रीबाबू" को "भारत रत्न" देने की मांग करते हैं....

ई.रंजीत कुमार/ नवादा लाइव नेटवर्क।

1947 में देश को आज़ादी मिली, उस समय भारत के सभी राज्य अपार भुखमरी, गरीबी, छुआछूत, अंधविश्वास, जमींदारी प्रथा जैसे अनेक विपत्तियों की मार झेल रहा था। उन सभी राज्यों में एक राज्य बिहार भी था। यहां भी छुआछूत, जमींदारी प्रथा, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसे नागों ने अपना फन काढ रखा था। उस समय बिहार की बागडोर हमारे नवादा के खनवां गांव (ननिहाल) में जन्मे बाबू श्रीकृष्ण सिंह ने संभाली और बिहार को न केवल मजबूत स्थिति में ला कर खड़ा किया, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिति को सुधारने में भी अपना योगदान दिया। इनका पैतृक गांव माऊर् है जो की हमारे नवादा लोकसभा के बरबीघा प्रखंड में है। श्रीबाबू को आधुनिक बिहार का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने बिहार के विकास के लिए अनेक कार्य किये।

1, उन्होंने सबौर में कृषि कॉलेज, राँची में कृषि एवं पशुपालन महाविद्यालय, दोली में कृषि महाविद्यालय, पूसा में ईख अनुसंधान संस्थान तथा सिंदरी में भारत का प्रथम खाद कारखाना स्थापित करवाये इसके अलावा उन्होंने कई विकासोन्मुख योजनाओं और कल कारखानों को बिहार को सौंपा।

2, बिहार में 29 चीनी मिलें सफलता के साथ चल रही थी और बिहार देश का दूसरा चीनी उत्पादक प्रदेश था। उन्होंने 2 दशक तक मुख्यमंत्री के पद पर बिहार की सेवा की और बिहार को वो स्थान दिलाया जिसका वो हकदार था। 31 जनवरी 1961 को पटना देशरत्न मार्ग - 4 सरकारी आवास पर उनका निधन हो गया। 

3, उन्होंने स्वस्थ, शिक्षित और शशक्त बिहार का सपना देखा, और अपने जीते जी उसको साकार भी रखा, लेकिन उन्हे क्या पता था उनके बाद की पीढी की सरकारें उनके सपने को इस प्रकार रौंधेगी की उसका नामोनिशान ही नही रहेगा। 

4, उनके बाद बिहार के विकास की कहानी फिर भी आगे बढ़ती रही, लेकिन इसे राहु ने तब अपना ग्रास बनाया जब 1990 में जनता दल की सरकार बनी और लालू जी बिहार के मुख्यमंत्री चुने गए और जंगल राज का प्रारंभ हुआ। 

उदाहरणार्थ, श्रीबाबू ने जिन चीनी मीलों की स्थापना की थी उसमे एक वारिसलीगंज, नवादा स्थित चीनी मिल भी है, इस चीनी मिल को वर्ष 1952 में स्थापित करवाया था उस वक्त मिल के स्थापना के लिए स्थानीय लोगों ने अपनी जमीनें दान में दी थी। वर्ष 1976 में सबसे ज़्यादा चीनी के उत्पादन के लिए इस चीनी मिल को भारत सरकार ने स्वर्ण पदक से भी नवाजा था, लेकिन अगले ही वर्ष बिहार सरकार ने बिहार राज्य चीनी निगम की स्थापना कर राज्य के कई चीनी मिलों का अधिग्रहण कर लिया, लगभग 16 वर्षों तक राज्य सरकार के अधीन चीनी मिल का संचालन हुआ। 

लेकिन 1993 में तत्कालीन लालू सरकार ने घाटे का सौदा बताकर इस पर ताला जड़ दिया और तब से ही यह चीनी मिल फिर से शुरू होने की बाट जोह रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां लगभग 1200 की संख्या में कर्मचारी काम किया करते थे और लगभग सैकड़ों गांवों के किसान, गन्ना सप्लाई किया करते थे। 

इतना ही नहीं 1997 आते आते सभी चीनी मीलों पर ताला लगा दिया गया, चीनी मिल ही नहीं, जितवारपुर की ठाकुर पेपर मिल भी 1997 में बंद करा दी गई थी। इसने 1,000 से अधिक लोगों को रोजगार दिया था लेकिन किसी भी सरकार ने इसे फिर से खोलने की कोशिश नहीं की और लोगों को पंजाब और दिल्ली जैसे अन्य राज्यों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

 कई उदाहरण हैं, लेकिन आज यही राजद के लोग रोज़गार की बात करते हैं। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी के दौर में बिहार ने एक ऐसा स्वर्णिम युग देखा था जिसमे बिहार देश के सबसे तेजी से विकास करते राज्यों की श्रेणी में आता था।  आज बिहार के लोग रोज़गार के लिए बाहर पलायन हो रहे हैं, और दूसरों का अपमान झेल रहे हैं, बिहारी मर्यादा को वापिस लाना ज़रूरी है। जातिगत भेदभाव से ऊपर उठना ज़रूरी है, वोट देने की वजह जात नहीं, विकास का मॉडल होना चाहिए।

श्रीबाबू आधुनिक बिहार के निर्माता रहे, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी रहे, जमींदारी प्रथा को समाप्त किया, दलितों को देवघर मंदिर में प्रवेश दिलाया, अविभाजित बिहार में कल_कारखाने लगवाए, बिहार को तब विकास में मीलों आगे ले गए, ऐसे विराट व्यक्तित्व को "भारत रत्न" मिले, हम बिहारवासी गौरवान्वित होंगे। 













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